Tuesday, 3 October 2017

हमने पुकारा और तुम चले आये रे

जग मोहन ठाकन
      हमने पुकारा और तुम चले आये रे

 ‘नोट छापना’ हर व्यक्ति का स्वप्न होता है.  हम सरकार में आये हैं कुछ करने के लिए , खाली हाथ पर हाथ रखकर बैठने के लिये नहीं . जब तुम सरकार में थे तो तुमने कौन से कम नोट छापे थे . हमारे भाग का तो मुश्किल से छीका टूटा है , अब यह भी तुम ही चाहते हो कि छीका हम तोड़ें और दूध  तुम पीयो. जब तुमने  छीका तोडा था तो तुमने हमें कौन सी मलाई चटाई थी ,जो आज हमें सत्ता सुख की  रसमलाई खाते देख लार टपका रहे हो. ज्यादा सयानी बिल्ली मत बनों . सौ चूहे खाकर  अब बिल्ली हाजी बन रही है .इस पर तुम्हे एतराज नहीं है . अरे ! हमें कम से कम पडौस के मंदिर तक तो हो आने दो . आपको तो हमारे मंदिर जाने पर भी दिक्कत है , जब भी हम पूजा तो दूर मंदिर का नाम भी लेते हैं तो तुम्हें पता नहीं क्यों आसमान में टूटते तारों के साथ साथ ईद का चांद नजर आने लगता है ?
हम जो कहते हैं करके दिखाते हैं . आपके समय में बैंक धनवान लोगों की धरोहर थी ,गरीबों को बैंक में घुसने तक में हिचकचाहट होती थी . हमने ऐसा तीर मारा, बैंक के आगे पीछे , अंदर बाहर सब जगह गरीब ही गरीब का आधिपत्य हो गया . जित देखूं तित लाल . पूंजीपति को भी अपना धन इन गरीबों के खातों में जमा कराना पड़ा . इन्हीं गरीबों से कमाया था . फिर तेरा तुझ को सौंपत क्या लागत है मोरा .
गरीबों का भी जुगाड़ पानी का धंधा चल पड़ा . हमने करोड़ों लोगों को एक झटके में रोजगार दे दिया . सब को देश हित में त्याग करने का एक आह्वान किया , तो सब बैंकों के आगे लाइन में लग गए . लाइन में लगने की अच्छी आदत तो तुमने लोगों को पहले ही डाल रखी थी .गैस के लिए लाइन , राशन के लिए लाइन , रेलवे की टिकट के लिए लाइन , रोजगार पाने के लिए बेरोजगारों की लाइन , चुनाव में टिकट के लिए लाइन यानि हर काम के लिए हर जगह लाइन . बस हमने तो इस आदत का सदुपयोग किया है . हम नए काम करने में विश्वास नहीं करते , हम तो पुरानी शराब को नए पैग में परोसना जानते हैं .चरखा तुम्हारा था , गाँधी जी तुम्हारे थे . हमने तुमसे गाँधी जी छीने , चरखा छीना और सूत हमने काता , काता कि नहीं काता ? तुमने बैंकों में गरीबों के खाते खोलने की स्कीम बनाई  , बिना बैलेंस के; नाम दिया ‘नो फ्रिल अकाउंट’. क्योंकि तुमने अभी तक अंग्रेजों वाली मानसिकता नहीं छोड़ी है . हमने क्या किया ? बस इसी का नाम जन धन खाता’ रख दिया और लोग टूट पड़े खाते खुलवाने के लिए . तुमने ‘जी एस टी’ लागु करने के लिए पूरा होम वर्क किया , ड्राफ्ट तैयार किया , पर इसे कानून का  दर्जा नहीं दे सके . तुम हमें ही नहीं मना  सके इसमें साथ देने के लिए . हमने नारा दिया सबका साथ –सबका विकास. तुम चुपचाप हमारे पीछे हो लिये, रस्सी से बंधी बकरी की तरह में में करते रहे और पीछे पीछे चलते गए . बकरी की विवशता है कि हरे घास के लोभ में कटने को पीछे पीछे चल पड़ती है .तुम्हारी इस विवशता को तुम बेहतर जानते हो , वैसे जानते हम भी हैं .खैर धन्यवाद  हमने पुकारा और तुम चले आये रे .


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