व्यंग्य
जग मोहन
ठाकन
मोदी के बयान से भड़की गाय –दूध देना बंद
श्रीमति
जी ने जैसे ही दूध दूहने के लिए बछड़े को खूंटे से खोलकर गाय के समीप छोड़ा , गाय ने
दुल्लती मार बछड़े को निकट भी नहीं फटकने दिया . जो गाय दूध का समय होते ही बार बार
रंभाने लग जाती थी , आज इतनी बेरुखी कैसे हो गयी ? जिस बछड़े को वह चाट चाट कर
निहाल हो जाती थी और आँख बंद कर उस पर
पूरा ममत्व लुटा देती थी , वो आज अपने ही
जाये को लात और सींग मारकर दूर भगा रही है . श्रीमती जी बछड़े को बार बार गाय के
नजदीक ले जाने का असफल प्रयास कर रही थी और बछड़ा माँ की नज़र से ही समझ गया था कि
आज कोई विशेष गड़बड़ है . वह गाय की तरफ मूंह भी नहीं कर रहा था . हम समझ गए थे कि
आज गाय दूध देने के मूड में नहीं है . जरूर कोई खान पान में कमी रही है . परन्तु
श्रीमती जी कहती हैं कि नहीं चारा चाट तो बराबर वही दिया है . हमें भी गाय रखते
हजारों वर्ष हो गए हैं . सदा से ही हमारे पूर्वज गाय ही रखते आये हैं , इसलिए इतना
तो समझ ही गए कि आज गाय माता जरूर किसी बात को लेकर नाराज़ हैं . अब तो गाय में हम इतना
रम गए हैं कि उसकी भाषा को भी कुछ कुछ समझने लगे हैं .खैर हम ठहरे पत्रकार बिरादरी
से , किस से कब क्या उगलवाना है इतना तो हम सीख ही गए हैं . अलग अलग भाषाओँ के
अखबारों और चैनलों के लिए इंटरव्यू कर करके भिन्न भिन्न भाषाओँ के ज्ञाता हो गए
हैं . पर पशुत्व की भाषा अभी भी नहीं सीख पाए
हैं .
क्या सोच
रहे हो?
गाय
की धीमी रम्भाहट हमें सुनाई पड़ी . अरे गौ माता तुम हमारे “मन की बात” समझती हो ?
अरे मुझे
गौ माता कह कर अपमानित मत करो . हम बेजुबान हैं
, तुम्हारी तरह बदजुबान नहीं . क्या कहते हो पशु केवल दूध देते हैं ,वोट
नहीं . पी लो दूध ? अच्छा ! तो अब तुम्हें भी लगने लगा है कि पशुओं के पास वोट
नहीं हैं . चालीस साल पहले तक गाय बछड़े को आगे करके सदा जीत पाने वाले माँ बेटे ने
हमें छोड़ा तो हमने भी उन्हें छोड़ दिया .
आज माँ बेटे की दूसरी पीढ़ी आ गयी पर हमें भूलने का खामियाजा अभी भी भुगत रहे हैं .
तुमने बड़ी चतुराई से हमें माता का दर्जा देकर विजय श्री पा ली . हम गौवर्गीय पशु
अभी भी इतने भोले ही रह गए हैं कि थोड़ा सा प्यार से पुचकारो तुरंत पावस कर दूध
देने लगते हैं .हम तुम्हारी “मन
की बात” की असली मंशा नहीं समझ पाए . तुम कहते हो पशु वोट
नहीं देते ? फिर क्यों पहलु खान मारे जाते हैं हमारे नाम पर ? लगता है हम तुम्हें
अब निरे पशु दिखने लगे हैं ,जिनके वोट नहीं होते . पर ध्यान से सुन लो हमारे वोट
नहीं हैं ,पर वोट बैंक हैं जो किसी को भी ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर करने का
सामर्थ्य रखते हैं . अभी भी सोच लो समय है
. हम तो पशु होकर भी दया भाव रखते हैं . छोडो बछड़ा और निकाल लो दूध . हम नहीं देख
सकते तुम्हारे बच्चों को बिना दूध के बिलखते हुए .
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